“धरोहर” (मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी विथ मोरल)

धरोहर

-निधि जैन

.          मुझे स्टोर रूम में धक्का दे कर उन्होंने दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया। मैं लगभग गिरती-संभलती फर्श पर बैठ गयी। कमरे में घुप अन्धेरा था।  शाम से ही बिजली भी नहीं आ रही थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। यह जनवरी की बारिश मुझे कभी से पसन्द नहीं थी। बीच-बीच में जोर से बिजली कड़कती और मैं सहम कर अपने आप में सिमट जाती। यह समय भयभीत होने का नहीं था। जल्द मुझे कुछ करना होगा, नहीं तो बहुत देर हो जायेगी। मैं यूँ ही हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठ सकती। मैंने अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाला, पर वह खाली था। मैं हमेशा कमरा छोड़ते समय मोबाइल अपनी जेब में डाल लेती हूँ पर शायद आज भूल गयी। अब क्या करूँ? कुछ समझ नहीं आ रहा था।

.          अन्धकार से भरा कमरा, तेज बारिश की आवाज और उस पर बिजली का कड़कना, कुल मिला कर बहुत ही भयानक माहौल था। पूरा शरीर दर्द से टूट रहा था। शायद दवा का असर खत्म हो गया था और दोबारा बुखार चढ़ रहा था। मैं वहीं जमीन पर लेट गयी। माँ बहुत याद आ रही थी। वह होती तो सीने से लगा लेती और मेरे बाल सहलाती हुई कहती, “मेरी लाडो डर मत, मैं तेरे पास हूँ।” माँ के साथ-साथ बचपन से अब तक की सभी खट्टी-मीठी यादें मेरे दिमाग में चलने लगीं।

.          मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के एक ऐतिहासिक शहर झाँसी में हुआ था। सम्पूर्ण भारत में कौन है जो झाँसी के नाम से परिचित नहीं था।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

.          रानी लक्ष्मीबाई की वीरता इस शहर की हर लड़की में स्वाभाविक रूप से थी। मैं इन सब से अलग, हमेशा डरी, सहमी, गर्दन झुकाये, हर बात पर अपनी सहमती दे देने वाली एक कमजोर लड़की थी। हमारा सात लोगों का परिवार था, माँ-पापा, दादी और हम चार बहनें। पापा और दादी को बेटे की चाह भी थी और जल्दी भी। आठ साल में माँ ने चार बेटियों की लाइन लगा दी। यह मैं नहीं कह रही ऐसा पापा और दादी दोनों का ही मानना था। उन्हें लगता था की यह माँ का ही कसूर है कि अब तक बेटा नहीं हुआ। दादी हर समय माँ को कोसती, “तूने तो लड़कियों की झड़ी लगा दी। अब की बार लड़का न हुआ तो अपनी बेटियों समेत मायके चली जाना। मैं अपने बेटे का दूसरा ब्याह करूँगी।” पापा खामोश खड़े रहते। वह सरकारी दफ्तर में एक कर्लक थे। उनके वेतन में इतने बड़े परिवार का गुजारा चलना मुश्किल था। गर्भ के समय पौष्टिक खाना न मिलने और सारा दिन काम करने के कारण माँ की सेहत दिन पर दिन गिर रही थी। उनके स्वास्थ्य पर न तो पापा का ध्यान था न दादी का। पापा का व्यवहार हम बहनों की तरफ पूर्णतः उदासीन था और दादी भी हमें कुछ खास पसन्द नहीं करती थी।

.          माँ एक बार फिर गर्भवती थी। उनकी रोज में तबीयत खराब रहने लगी। जैसे-तैसे वह घर का काम करती। मैं सारा दिन उसके साथ-साथ रहती और काम में उनकी मदद करती। दादी तो बस सारा दिन खाट पर बैठी माँ को चेतावनी देती रहती, “याद रखना अब की बार लड़का न हुआ तो मैं तेरे साथ क्या करूँगी।” एक दिन माँ मुझे अपने सीने से लगा कर फूट-फूट कर रोने लगी। मैं उसे देख कर डर गयी। आज से पहले मैंने उसे कभी एक आँसू भी गिराते नहीं देखा था। बहुत सहन शक्ति थी उसके अन्दर। मैंने उसके आँसू पोंछते हुए कहा “रो मत माँ, अब की बार भय्या जरूर आ जायेगा। पापा-दादी सब खुश हो जायेंगे।” माँ ने धीरे से कहा “अपनी बहनों का ख्याल रखना।” मैं नौ साल की मासूम बच्ची उसकी बातों का अर्थ नहीं समझी। दो-तीन दिन बाद माँ ने एक बेटे को जन्म दिया और इस कठोर दुनिया को अलविदा कह दिया।

.          पापा और दादी भाई के आने से इतने खुश थे कि माँ की कमी उन्हें महसूस ही नहीं हुई। भाई की देखभाल का जिम्मा दादी ने संभाल लिया और तीनों बहनों का मैंने। नौ साल की उम्र में मैं उनकी माँ बन गई।

.          घर की जिम्मेदारियों के साथ जैसे-तैसे मैंने इंटर पास कर लिया। आगे पढ़ाने के लिए न तो पापा के पास पैसे थे और न दादी की सहमति। अठारह वर्ष की आयु में मेरा विवाह एक तीस साल के लड़के के साथ तय हो गया। महेश एक सरकारी दफ्तर में अकाउंटेंट थे। वह मुझे बिल्कुल भी पसन्द नहीं थे। एक तो उम्र में इतना फासला, रंग काला, सर पर कम बाल और ऊपर से क्लर्क वाली नौकरी। ऐसा लग रहा था जैसे मैं माँ की जिन्दगी को दोहराने जा रही हूँ। पापा और दादी से कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं थी। वह पहले ही कह चुके थे “लड़के को दहेज में एक पाई भी नहीं चाहिए। चार-चार लड़कियों की शादी और भाई की पढ़ाई के लिए पैसो की जरूरत थी। कम से कम एक तो बिना दहेज के निपट जायेगी।”

.          बसन्त पंचमी के दिन मेरा विवाह हो गया। भारी मन से मैं अपनी बहनों को भगवान के भरोसे छोड़ कर अपने पति के घर आ गयी। वह मध्य-प्रदेश के एक छाटे से शहर छतरपुर में रहते थे। उन्होंने पहली रात को ही कहा, “अभी तुम्हारी उम्र कम है। हम बच्चे के बारे में तीन-चार साल बाद ही सोचेगें। तब तक तुम चाहो तो पढ़ाई कर सकती हो, वैसे मुझे तुम से नौकरी कराने में कोई रूचि नहीं है। दूसरी अहम बात, गाँव में हमारी एक पुश्तैनी जमीन है। उसे बटाई पर दे रखा हैं। उससे ऊपरी आमदनी हो जाती है, इसलिए तुम्हें कभी पैसों की कोई कमी नहीं होने दूँगा। तुम इस घर की मालकिन हो। तुम को सारे हक प्राप्त हैं पर पैसो के लेन-देन के बारे में कभी बात मत करना।”

.          महेश की नौकरी पिताजी की नौकरी जैसी सामान्य ही थी पर यहाँ सब कुछ बहुत फर्क था। यह घर हमारे घर से काफी बड़ा था। घर का काम करने के लिए एक नौकर था। एक ए.सी. गाड़ी भी थी। महेश हमेशा छुट्टी के दिन मुझे आस-पास के स्थानों पर घूमाने ले जाते। महँगे रेस्ट्रा में खाना खिलाते, फिल्म दिखाते। मेरे साथ वह एक दोस्त की तरह व्यवहार करते। कुछ समय बाद ही मुझे उनके साथ उम्र का फासला महसूस नहीं हो रहा था। रंग-रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण था उनका मेरे साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार। घर के खर्च के अलावा हर तीन-चार महीने में वह नोटों की एक गड्डी मेरे हाथ में रख देते, “यह तुम्हारे लिए है। जैसे चाहो खर्च कर सकती हो।”

.          छतरपुर से झाँसी का सफर सिर्फ तीन घन्टे का था। महीने में एक बार हम जा कर सब से मिल आते। कभी जब महेश जाने में असमर्थ होते तो जोर दे कर मुझे ड्राइवर के साथ भेज देते, उनका कहना था, “तुम नहीं जाओगी तो सब मायूस होगे और सबसे ज्यादा तुम्हारी बहनें।” अपने खर्च के लिए दिए गये रुपयों से मैं अपनी बहनों के लिए तोहफे ले जाती। मेरे छोटे से सहयोग से उनकी भी स्थिति बेहतर हो रही थी।

.          मेरी शादी को दो साल हो गये थे। इस बीच मैंने बी.ए. कर लिया था। पिताजी और महेश में अन्तर साफ दिख रहा था। मैं बहुत खुश थी। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। मेरे चारों ओर हर तरह की सुख-सुविधा थी, फिर भी कभी-कभी मन बेचैन हो उठता। महेश की कुछ गतिविधियाँ संशय पैदा करती पर तुरन्त ही मैं अपने मन को समझा लेती, इतना अच्छा इंसान कभी भी गलत नहीं हो सकता।

.          जनवरी का महीना था। इस बार कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, पर टूरिस्ट की संख्या में कोई कमी नहीं थी। जाड़े की छुट्टियाँ खत्म होते ही हमेशा की तरह यात्री कम होने लगे। कुछ विदेशी यात्री अब भी हमारे घर के पास वाले गेस्ट हाउस में रुके थे।  अक्सर विदेशी लड़के इसी गेस्ट हाउस में रूकते थे। महेश उनसे दोस्ती कर लेते और वह जाते समय उन्हें कुछ छोटा-मोटा तोहफा दे जाते। महेश भी उनकी खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ते।

.          एक शाम गेस्ट हाउस से वापस आ कर महेश ने कहा, “मुझे कुछ काम है, इसलिए मैं कल तुम्हारे साथ झाँसी नहीं चल पाऊँगा। तुम ड्राइवर के साथ चली जाना।” मैंने सहजता से कहा, “कोई बात नहीं इस बार रहने देते हैं। अगले हफ्ते साथ ही चलेंगे। वैसे भी सुबह से मेरी तबीयत कुछ ढीली है। ठन्ड़ के साथ-साथ कोहरा भी काफी घना पड़ रहा है।” महेश कुछ नाराज होते हुए बोले, “कौन सा तुम को पैदल जाना है जो ठंड और तबीयत का वास्ता दे रही हो। घर से घर तक अपनी गाड़ी से जाना है। गाड़ी ड्राइवर को चलानी है। इन लोगों को आदत होती है कोहरे में चलाने की।” मैं हदप्रद महेश को देख रही थी। मैंने ऐसा आवेश उनमें पहले कभी नहीं देखा था। जल्द उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और वह मेरे पास आ कर प्यार से बोले, “मैं तो बस इस लिए कह रहा था कि सब लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे। अगर तुम नहीं जाओगी तो सब उदास हो जायेंगे विशेष कर तुम्हारी बहनें।” मैंने उनकी बात को समझते हुए जाने के लिए हाँ कर दी।

.          रात तक मेरी तबीयत ज्यादा खराब हो गयी। पूरे शरीर में दर्द के साथ बुखार भी चढ़ गया। मैं दवा खा कर सोने जा ही रही थी कि महेश ने मेरे माथे पर हाथ रखते हुए कहा “अरे! तुम को तो काफी तेज बुखार है। कल झाँसी जाने की जरूरत नहीं। अगले हफ्ते हम साथ में चलेंगे। तुम आराम करो। मैं फोन कर के उन लोगों को सूचित कर देता हूँ।” यह कह कर महेश कमरे से चले गये। मैंने आँखें बन्द कर लीं और जल्द ही गहरी नींद में सो गई।

.          बीच रात मेरी आँख खुली तो कमरे में अन्धेरा था। बाहर गैलरी से लालटेन की धीमी सी रोशनी आ रही थी। शायद लाइट अभी तक नहीं आई थी। बैठक से महेश के फुसफुसाने की आवाज आ रही थी। इतनी रात को वह किस से बात कर रहे थे। मैंने मोबाइल पर समय देखा तो रात के १२ बज रहे थे। तबीयत पहले से काफी बेहतर महसूस हो रही थी। मैं पलंग से उठ कर बैठक की ओर चल दी।

.          महेश की बातें कानों में पड़ते ही मेरे कदम बैठक के दरवाजे पर ही ठिठक गये। वह किसी से फोन पर कह रहे थे, “मूर्ति मेरे पास आ गई है पर मैं इस बार सौदा अपने घर पर नहीं कर पाऊँगा। मेरी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वह घर पर ही है। आप मूर्ति अपने घर मँगवा लें और तय नियमों के अनुसार उसे बँधवा लें।” यह बोल कर महेश खामोश हो गये। शायद दूसरी तरफ वाला व्यक्ति कुछ कह रहा था। अचानक झल्लाते हुए महेश ने कहा, “क्या बेवकूफी वाली बात कर रहे हो। गेस्ट हाउस में सौदा करने में जोखिम है। किसी को पता चल गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे। हमारे बीच पहले से तय था कि सौदा मेरे घर पर ही होगा और आपात स्थिति में तुम्हारे यहाँ। किसी भी तीसरे स्थान पर नहीं। वह विदेशी छोकरे कल सुबह आठ बजे मूर्ति लेंगे और वहीं से हवाई अड्डे के लिए निकल जायेंगे।” फोन रख कर महेश कुर्सी से उठे तो मैं परदे की आड़ में छुप गई। उन्होंने गैलरी में रखे एक लकड़ी के बक्से पर नजर डाली और बाथरूम के अन्दर चले गये।

.          परदे की आड़ से निकल कर मैंने बक्सा खोला तो मेरे पैरो तले जमीन खिसक गई। बक्से में हमारे देश की प्राचीन धरोहर, एक खूबसूरत मूर्ति रखी थी। अब बात मुझे पूरी तरह समझ में आ गई थी। मेरा पति, जिसे आज तक मैं एक बहुत ही अच्छा इंसान समझ रही थी, वह अपने देश के साथ गद्दारी कर रहा था। अब मुझे यह भी समझ आ गया कि यह पैसा जिसे मैं अपने ऐश-ओ-आराम में इस्तेमाल कर रही थी वह कहाँ से आ रहा था। मुझे अपने आप से घिन आने लगी। दरअसल कोई जमीन थी ही नहीं और न कोई गाँव था। इन दो सालों में न जाने कितनी बार मैंने गाँव चलने को कहा पर वह हमेशा कोई न कोई बहाना बना देते। मैंने कई बार कहा, “गाँव में कोई तो अपना होगा। दूर-दराज का ही सही। चल कर मिलते हैं। इसी बहाने अपनी जमीन भी देख लेंगे और गाँव भी।” वह कभी हँस कर ओर कभी झुंझुला कर बात टाल जाते।

.          मैं उस लक्ष्मीबाई के शहर की लड़की थी जिसने अपने देश के लिए अंग्रेजों से बहुत कम उम्र में लौहा लिया था। उन्होंने निर्भीक हो कर कहा था, “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगीं।” सब कुछ जानते हुए मैं अपनी आँखें मूंद नहीं सकती थी। मैंने तय कर लिया कि मैं किसी भी सूरत में इस मूर्ति को विदेशियों के हाथ नहीं लगने दूँगी, पर कैसे? एक कमजोर और डरपोक लड़की अपने देश की धरोहर को कैसे बचायेगी? अभी मैं यह सब सोच ही रही थी कि महेश ने मेरे कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा, “यहाँ क्या कर कही हो? तबीयत अब कैसी है?” मैं उन्हें अपने सामने खड़ा देख डर के मारे काँपने लगी। मैंने भर्राई आवाज में कहा “वह….मूर्ति…” उन्होंने मुसकुरा कर कहा, “मरम्मत के लिए कल दिल्ली भेजनी है।” मेरी आवाज और पैर काँप रहे थे पर मैंने अपने को सम्भालते हुए कहा, “मैंने आप की सब बातें सुन ली है। यह गलत है। आप अपने स्वार्थ के लिए देश के साथ धोखा नहीं कर सकते। मैं आप को ऐसा नहीं करने दूँगीं।” महेश ने कुछ व्यंगात्मक हँसी के साथ कहा, “अच्छा! भला वह कैसे?” मैं उनके प्रश्न के लिए तैयार नहीं थी। मैंने लड़खड़ाते शब्दों में  कहा, “आप को समझाऊँगी। आप से विनती करूँगी।” महेश जोर से ठहाका लगा कर हँसते हुए बोले, “और मैं तब भी न माना तो?” मेरे अन्दर की लक्ष्मीबाई धीरे-धीरे जाग रही थी। मैंने एक झटके में कह दिया, “तो मैं पुलिस बुलाऊँगी।” मेरे चेहरे के भाव देख कर वह कुछ असमंजस में पड़ गये। महेश सख्त लहजे में बोले, “कमरे में जा कर आराम करो और कल सुबह १० बजे तक कमरे से बाहर मत निकलना।” कुछ क्षण मैं शांत खड़ी रही फिर आँखें बन्द करके सच्चे मन से रानी लक्ष्मीबाई को याद किया। एक अलग साहस और स्फूर्ति का एहसास हुआ। मैं झट से लकड़ी के बक्से पर बैठ गई और पूरे जोश से कहा, “जब तक यह मूर्ति सही हाथों में नहीं पहुँच जाती, मैं यहाँ से नहीं उठूँगीं।” वह विस्मय से मुझे देखने लगे। सपने में भी वह मेरा ऐसा रूप नहीं सोच सकते थे।

.          महेश ने पूरी ताकत से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींचते हुए स्टोर रूम की ओर ले गये। मैं अपने आप को उनकी पकड़ से छुड़ाने का प्रयास कर रही थी पर पकड़ इतनी मजबूत थी कि मेरा प्रयास असफल रहा। उन्होंने गुस्से से कहा, “अपने आप को लक्ष्मीबाई समझती है। पहले दिन ही समझाया था मेरे मामले में अपनी टाँग मत अड़ाना। अब चुप-चाप पड़ी रहो यहाँ। अगर आवाज निकाली तो हमेशा के लिए बन्द कर दूँगा। पहले मैं मूर्ति से निपट लूँ, फिर तुम्हारा फैसला करता हूँ।” कहते हुए उन्होंने मुझे कमरे में धक्का दिया और कुन्डी बाहर से बन्द कर दी।

.          मेरे जीवन की कहानी पूरी हो गई थी, पर मैं अभी भी जमीन पर डरी, सहमी, असहाय पड़ी थी। अब भी मूसलाधार बारिश हो रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आसमान भी मेरी हालत पर रो रहा था। मैंने हाथ जोड़ कर कहा, “हे भगवन्! जिन्दगी में पहली बार हिम्मत करके कुछ अच्छा करने का प्रय़ास कर रही हूँ।”

.          समय बीतता जा रहा था। मैं उदास बैठी इसी उधेड़-बुन में लगी थी कि अचानक जोर से बिजली चमकी और उसकी रोशनी में मुझे जमीन पर पड़ा मेरा मोबाइल नजर आ गया। शायद जब महेश ने मुझे धक्का दिया तब वह जेब से निकल कर जमीन पर गिर गया था। मैंने झट से फोन उठा लिया और बिना विलम्ब किये काँपते हाथों से पुलिस स्टेशन का नम्बर मिलाया। घंटी जाते ही किसी ने फोन उठाया और कड़क आवाज में कहा “हेलौ! थाना छतरपुर।” मैं घबरा कर फोन काटने ही जा रही थी कि एक बार फिर उधर से आवाज आई। इस बार आवाज में कुछ कोमलता थी। मैंने दबी आवाज में कहा “मूर्ति….मूर्ति..” तभी दरवाजे के पास कुछ आहट हुई और मैंने डर कर फोन काट दिया। दरवाजे पर आहट मात्र मेरा भ्रम था। मैंने दोबारा फोन मिलाया। उधर से हेलौ की आवाज सुनते ही मैंने एक सांस में सब कुछ कह दिया, “एक प्रचीन मूर्ति आज विदेशियों को बेची जा रही है। वह लोग सरकारी गेस्ट हाउज में ठहरे हैं। आज ८ बजे वह लोग मूर्ति ले कर हवाई अड्डे जायेंगे।” उधर से आवाज आई, “यह सब आप को कैसे पता?” क्षण भर को दोनों तरफ खामोशी छा गई। मैंने झिझकते हुए कहा, “यह सौदा मेरे पति महेश करवा रहे हैं। मूर्ति अभी कुछ घंटे पहले मेरे घर पर ही थी। मेरे पति ने उसे कहीं और भेजने वाले थे। एक और आदमी उनके साथ मिला हुआ है।” फोन के दूसरे तरफ से आवाज आई, “आप इस वक्त कहाँ हैं?” “मैं अपने घर पर ही हूँ। मेरे पति ने मुझे स्टोर रूम में बन्द कर दिया है। आप जल्दी आइये।” उधर से कोई आवाज नहीं आई। मैंने घबरा कर कहा “आप आयेंगे न?” उन्होंने संवेदना के साथ कहा, “आप परेशान न हों, हम १० मिनट में पहुँच रहे हैं।”

.          १०-१५ मिनट में पुलिस हमारे घर पहुँच गई। एक सिपाही ने आकर स्टोर का दरवाजा खोल दिया। जब मैं बैठक में पहुँची तो थाना अध्यक्ष सूर्य प्रताप ने हाथ जोड़ कर मेरा अभिवादन किया। मैं घबराई नजरों से इधर-उधर देख रही थी। वह समझ गये कि मेरी निगाहें क्या ढूँढ रहीं हैं। उन्होंने बताया, “आप के पति व दो विदेशी लड़के गिरफ्तार कर लिए गये हैं। वह लोग बाहर जीप में हैं। मूर्ति अब पूर्ण रूप से सुरक्षित है। आप को घबराने या डरने की जरूरत नहीं। एक सिपाही आप की सुरक्षा के लिए घर के बाहर रहेगा।” यह कह कर वह जाने लगे। दरवाजे पर पहुँच कर वह ठिठके और पलट कर उन्होंने कहा, “आप बहुत बहादुर हैं। अपने पति के खिलाफ जाना आसान बात नहीं। आप को कोई भी जरूरत हो तो निसंकोच कहियेगा।”  मैं सदमे में थी, कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। पता नहीं कहा से इतनी हिम्मत आ गई और मैं यह सब कर पायी।

.          जीप स्टार्ट होने की आवाज सुन कर मैं भाग कर दरवाजे पर गई। सर झुकाये महेश जीप में बैठे थे। उन्होंने मुझे नहीं देखा पर मैं देर तक उन्हें जाते देखती रही। मैंने खुद अपनी खुशियों में आग लगा दी थी। पिताजी से मुझे कोई उम्मीद नहीं थी। अब स्वयं ही मुझे एक नयी जिन्दगी की शुरूवात करनी होगी। मेरी पढ़ाई मुझे आत्मनिर्भर बनने में मदद करेगी। जिसके लिए मैं हमेशा महेश की श्रृणी रहूँगी। जानती हूँ यह सफर आसान नहीं होगा फिर भी मुझे कोई पछतावा नहीं बल्कि गर्व है कि मैंने एक बार फिर झाँसी का नाम पूरे भारत में ऊंचा कर दिया।

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4 Responses

  1. Shefali jain says:

    It’s such a nice and inspirational story! Just loved it.

  2. Anju Garg says:

    Dharohar story is very inspiring and very well written

  3. Neena Jain says:

    Very well written and inspiring story …

  4. Jammu and Kashmir Pin Code says:

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